पहली अप्रैल को खेला होता है। दुनिया भर में खास महत्व का दिन है। इसबार यह नंदीग्राम में मतदान का दिन है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मैदान में है। पुराने साथी सुबेन्दु अधिकारी उनसे मुखातिब है। सीधी टक्कर है। आरपार की लड़ाई है। खेला जारी है। पदयात्रा के लिए पोपुलर मुख्यमंत्री को एक पैर में प्लास्टर चढाकर दौड़ना पड़ रहा। जनता समझदार है। जीत हार की चाभी उसके हाथों में है। लिहाजा, दो मई को पता लगेगा कि कौन अप्रैल फूल या कौन सत्तारोही बना।
लोकतंत्र का पुराना मिथक है। मुख्यमंत्री अथवा मुख्यमंत्री का प्रत्याशी चुनाव हारा नहीं करते। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री हैं, तो भारतीय जनता baldur's gate 3 पार्टी संकेतों में कह रही है कि चुनाव जीतने पर मतुआ समुदाय के नेता सुबेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे। हालांकि यह मिथक पश्चिम बंगाल में टूटता रहा है। 1972 में ज्योति बसु उप मुख्यमंत्री थे। उनको मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट कर मैदान में उतारा गया। कांग्रेस ने दमदार पेशबंदी की। कामरेड बसु अपनी पारंपरिक विधानसभा सीट बारानगर में धोखा खा गए। खेला हो गया। हार से नाराज सीपीएम ने पांच साल तक विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा ही नहीं लिया। यह कामरेड ज्योति बसु के सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री होने का रिकार्ड बनाने से पहले की बात है।
मुख्यमंत्री के चुनाव हारने की घटना हाल फिलहाल पश्चिम बंगाल के पड़ोस में हुआ। झारखंड में रघुवर दास मुख्यमंत्री थे। उनकी डबल इंजन की सरकार भाजपा के लिए तरक्की का ब्रांड एम्बेस्डर थी। जनता को ओवर रेटिंग पसंद नहीं आया। बंगाली असर वाले जमशेदपुर पूर्वी की पारंपरिक सीट से मुख्यमंत्री रघुवर दास 2019 में चुनाव हार गए। उनके मंत्रिमंडल के सदस्य रहे सरजू राय आखिरी वक्त पर निर्दलीय प्रत्याशी बन उनको अप्रत्याशित पटखनी दे दी। हार के भय से पड़ोसी बिहार में मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने विधानसभा चुनाव लड़ना पसंद ही नहीं किया। चयनित होकर विधान परिषद रास्ते आकर सत्ता सम्हाले है। ओडिशा में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के लिए लोकप्रियता कोई समस्या नहीं। फिर भी उन्होंने एहतियातन कदम उठाना शुरु कर दिया है। लोकसभा ने ओडिशा में विधान परिषद के गठन के प्रस्ताव को मंजूर कर लिया है। उत्तर प्रदेश के फायर ब्रांड मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी विधानसभा चुनाव लड़कर जीतने वाले खतरों के खिलाड़ी बनना पसंद नहीं। खतरे को भांपकर विधान परिषद के रास्ता को ही अपना रखा है।
विधान परिषद जनता के चमके की आशंका से डरे सहमे नेताओं का आसरा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी चाहती हैं कि पश्चिम बंगाल में विधान परिषद बने। इस बार तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों की घोषणा करते वक्त टिकट नहीं मिलने से निराश नेताओं को ढांढस बंधाते हुए उन्होंने कहा है कि सत्ता में वापसी पर वह बंगाल में विधान परिषद की दिशा में कदम उठाएंगी ताकि कथित योग्य राजनेताओं को पिछले दरवाजे से सत्ता में लाया जा सके। विधान परिषद जब बनेगा तब बनेगा फिलहाल विधानसभा के हंगामेदार चुनाव का वक्त है। यह अनगिनत टके का सवाल है कि दो मई के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता पर कौन बैठता है।
यह नंदीग्राम विधानसभा चुनाव से तय होना है। जोश का प्रदर्शन करते हए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नंदीग्राम को महत्ता दिलाने के लिए बड़ा दांव खेला है। वह पारंपरिक विधानसभा सीट भवानीपुर को छोड़कर मेदिनापुर के नंदीग्राम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रही है। नंदीग्राम में 30 प्रतिशत अल्पसंख्यक हैं। शायद यही उनकी उम्मीद की डोर हैं। हालांकि भाजपा की मजबूत पेशबंदी उम्मीद पर पानी फेरने के लिए आमदा है। हर वोटर तक पैठ बनाने और तृणमूल समर्थकों को तोड़कर भाजपा में मिलाने के लिए केंद्रीय मंत्री धर्मेन्दर प्रधान समेत कई आला नेता सब छोड़छाड़ महीने भर से नंदीग्राम में कैंप किए बैठे हैं। हालांकि सीपीएम ने यहां ममता के लिए कॉस्मेटिक मदद की राह छोडी है। तृणमूल ने मुश्किल से इसे सीपीएम से छिना था। अब सीपीएम ने तृणमूल के समक्ष सेरेंडर कर रखा है। ममला त्रिकोणीय के बजाय सीधी टक्कर का है।
यहां के तृणमूल विधायक सुबेन्दु अधिकारी बीजेपी के पोस्टर ब्याय हैं। पिछला चुनाव उन्होंने सवा लाख से अधिक मतों से जीता था। उनके परिवार का नंदीग्राम से नजदीकी रिश्ता है। उनके भाई और पिता इस इलाके से तृणमूल सांसद रहे। इस चुनाव में भाजपामय हो रखे हैं। सुबेंदु की जीत हार पर बंगाल की अगली सरकार का दारोमदार है। सुबेन्दु के सांसद पिता शिशिर अधिकारी ने सुरर्रा छोडते हुए कहा है कि बेटे का मुख्यमंत्री होना हर पिता cancer colorectal की ख्वाहिश होती है। लिहाजा, संकेतों में नंदीग्राम की जनता से उन्होने कह दिया है कि सुबेंदु जीते तो सुबेंदु मुख्यमंत्री होंगे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए नंदीग्राम नया नहीं है। 2007 में सीपीएम को सत्ताच्युत करने के लिए उनके नेतृत्व में सबसे बड़ा आंदोलन यहीं छेड़ा गया था। सुबेन्दु तब ममता के सिपहसलार थे। अभिषेक बनर्जी को तृणमूल की विरासत सौंपने की आशंका में हुए विद्रोह ने सुबेंदु समेत तृणमूल के पुराने दिग्गजों को भाजपा के शरण में पहुंचाया है। हालांकि इसकी एक अन्य बड़ी वजह केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता when does the world cup start रही है। जिनको हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट से चिटफंड घोटालों की जांच मिली है। इन घोटालों में फंसे तृणमूल नेता केंद्र में सत्तारुढ भाजपा के साथ होने को मजबूर हुई है। 2014 से केंद्र में सत्तारुढ़ होने के बाद से भाजपा निरंतर पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करने की जद्दोजहद में लगी है।
